Wednesday, October 31, 2007

खोसला का घोसला

खोसला का घोसला ऐसी फिल्म है जो आपको हसयेगे और दो मिनट बाद
रुला भी डे गी. इस फिल्म एक परिवार के ऊपर है: खोसला परिवार के
बारे में. इस परिवार में पांच सदसिये हैं: माता-पिता (क.क.
खोसला जो कि इस कहानी के मुखिया अभिनातय हैं), और तीन बचे (दो
लड़के और एक लड़की). खोसला परिवार एक माध्यम वर्ग परिवार होता
है, और क.क. खोसला ने इस परिवार के लिए बोहुत से सपने देखे
होतें हैं. इन में से एक सपना है कि एक बड़ा सा घर बनाए जिसमे
सब परिवार के सदस्ये एक साथ ख़ुशी से रहें. इस सपने को पुरा
करने के लिए, खोस्लाजी ने बोहुत से पैसे अखाते किये होतें है. जब
प्लोत खरीदने जातें हैं, तो बिचारे खोसला जी एक बोहुत बड़ी
साजिश में फस जातें हैं. जब उनको पता चलता है कि जो पैसे
उन्होने घर के लिए रख वय थे, वो पैसे बुरे हाथों में चले
गए हैं, पुरा परिवार ज़बरदस्त कोशिश करता है उस घर के प्लोत
को वापिस पानी के लिए. इस फिल्म में बोहुत सी चीजे दिखाते हैं,
जैसे कि एक परिवार का प्यार, अपने सपनों को पूरे करने कि द्रिड
निश्चय, और दिखातें है कि अलग तरीके के लोग ज़िंदगी भर
मिलते रहते है, और उनपर अँधा विश्वास नही करना चाहिऐ.

करवा चौथ

इस हफ्ते सोमवार को करवा चौथ था. मेरी मम्मी ने पूरा दिन न कुछ
पिया, न कुछ खाया जब तक चाँद नहीं निकला. यह त्यौहार साल में
एक ही बरी आता है, और उस दिन हर पत्नी अपने पति कि लंबी उमर के
लिए यह व्रत रखतीं हैं. इस व्रत के पीछे एक कहानी का हाथ है.
कहते हैं के बोहुत पहले एक रजा और रानी रहते थे. रानी के तीन
भाई थे, तो उसके पहले करवा चौथ पर, उसने व्रत रखा. वोह
पूरा दिन सूई धागे से काम करती रहती है (जो कि नहीं करना होता
है) जब उससे चंद नहीं दिखा, तो उसने अपने भाइयों को भेजा चंद
देखने के लिए. उसके भाइयों को खूब भूक लगी थी, तो उन्होनें
झूट बोलकर अपनी बहिन (यानी रानी) को खाना खिला दिया. जब वोह घर
लॉट टी है तो उसे पता चलता है कि उसके पति को बोहुत साड़ी
सूयें चुबी हूएं हैं. तो इस्सी लिए करवा चौथ पर बोहुत ध्यान
रखना पड़ता है ताकि ऐसा वैसा कुछ न हो.

Wednesday, October 24, 2007

इअसा शो

इस विश्वद्यालय में कहीं तारा के क्लब और ओर्गानिज़शन्स हैं। इन में से हैं एक जो हिन्दुस्तानी छात्रों को अपने संस्कृति से मिलाता है। में बात कर रहीं हूँ इअसा के बारे में। पिछले साल मैंने पहली बार यह संघटन में हिस्सा लिया। हर साल इअसा दिवाली के आस पास एक कल्तुरल शो पेश करता है। इस शो में हर तरह के भारतीय संगीत और नाच पेश किया जाता है। रास से लेकर भंग्रा, इस विश्विदाल्या के छात्रों को मौका मिलता है अपने मनपसंद गानों पर नाचने का और बोहुत सारे और हिन्दुस्तानी छात्रों से मिलने का। पिछले साल में बंजरण डान्स में थी। मैने पहले काफी सारे डान्स स्टेज पर किये होयें हैं, लेकिन उनमे से ज़्यादातर सिर्फ पुन्जबी गानों पर भंग्र किया हुआ था। तो इस बहाने मैंने बोल्ल्य्वूद के बोहुत मजेदार गानों पर चार हजार लोगों के सामने डान्स किया। शो कि तयारी में कम से कम दो तीन महीने तो लग ही जाते हैं, तो तब तक अबनी ग्रुप के और छात्रों से अची दोस्ती भी हो जाती है। हमारा डान्स पिछले साल काफी अच्छा था, और दूसरे दंन्स के छात्रों को भी ये पता था, इसी लिए काफी बाचों को इस साल बंजरण डान्स मी हिस्सा लेना था। इस साल में और मेरी एक सहेली बंजरण डान्स चोरेओग्रफ कर रहे हैं। शो अगले हफ्ते है, और जोरों से प्रक्टिस हो रही है। रोज़ कम से कम तीन चार घंटे प्रक्टिस होती है। इस साल डान्स में मेरा भाई, मेरी रूम्माते, और मेरी अची सहेली भी है। डान्स मुझे बोहुत अच्छा लगता है तो इसी लिए मुझे बोहुत जोश आता है। अगले हफ्ते मेरे सारे रिश्तादर और दोस्त आ रहें है मेरा डान्स देखना। आशा करती हूँ के सब तीख ताख जाये....

Wednesday, October 10, 2007

bharat ke bachchey


पिछले साल भारत कि सर्कार ने कानून बनाया था जिसमे लिखा था के चौदन साल या चोटी उमर के बचे काम नहीं कर सकते. लेकिन, सेव द चिल्ड्रेन ग्रुप ने यह पता लगाया है कि आज भी १.२ करोड़ बचे काम कर रहें है. इन में से २ लाख बचे या तो घरों में नौकार हैं, या फिर दुकानों में चोटी मोती नौकरियां करते हैं. इस कानून के मुताबेय ना तो यह गरीब बचे नौकर का काम कर सकते हैं, बल्की वे होटल, रेस्तौरांत, चाय कि दुकानों में भी नहीं काम करसकते. लेकिन इस कानून के पास होने सय कोई फरक नहीं पड़ा. आज भी उतने ही बचे यही काम कर रहें है. अब तक सिर्फ २२२९ केसेस ही रिपोर्ट हे हैं. सरकार कहती है कि इन बचों को कम पय्गर मिलती है, और अगर कोई वे गलत काम करें तो उन्हें पीटा भी जाता है, तो फिर सरकार इस कानून पर ज़्यादा दबाव क्यों नहीं दाल रही है. मेरे दादी के पास भी एक चोटी लडकी काम करती है, लेकिन हमें तो पता भी नहीं के यह कानून के खिलाफ है. मुझे लगता है कि सरकार को बेहतर अद्वेर्तिस्मेंत करनी चाहिऐ ताकी लोगों को पता तो चले.

Wednesday, October 3, 2007

भारत कि फिएल्ड हॉकी टीम

पिछले हफ्ते भारत क्रिकेट का २०-२० वर्ल्ड कप जीत के आयी. दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान को हरा कर पहली बार भारत यह वर्ल्ड कप जीता. वापिस आकर पूरी टीम को बोहत समान मिला. उसी हफ्ते भारत कि फील्ड होकी तें पहली बारी असिया कप जीत कर आयी. क्रिकेतेर्स गो दीया गया समान देख कर, हॉकी तीम को बोहत बुरा लगा. वोह भी तो भारत के लिए जीत कर आये थे? तो फिर उनको इतना समान क्यों नहीं दिया गया? हर क्रिकेटर को पांच लाख रूपए मिले और हर होक्क्य प्लेयर को कुछ भी नहीं. यह सब देख कर हॉकी टीम ने स्ट्राइक कि. टीम के चार प्लेयर और उनका एक कोच हुन्गेर स्ट्राइक पर गये क्यूंकि उनको लगता है कि सब भार्तिये खिलाड़ियों को समान मिलना चाहिय ना कि सिर्फ क्रिकेतेर्स को. भारत का नेशनल खेल फिएल्ड हॉकी है तो फिर जब भारत कि टीम जीत कर आयी उनको इस जीत के लिए पहचाना क्यों नि गया. कहीं लोग कहते हैं कि हमारी सारकर में बोहत कोर्रुप्शन है और इसी लिए उनको उनकी जीत के लिए पहचाना नहीं गया. इस स्ट्राइक से शायद हमारी सर्कार और भारत के लोगों को थोड़ी अकाल अजये. सब खिलाड़ियों को पहचान और समान दिया जाना चैहेय आख़िर में वोह हमारे ही देश को रेप्रेसेंत करते हैं।